रूद्रप्रयाग

कालीमठ घाटी के पग – पग इन दिनों बसन्त अपने यौवन पर

धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना का केन्द्र है

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लक्ष्मण सिंह नेगी/रुद्रप्रयाग।

हिमालय के आंचल में जगत कल्याण के लिए तपस्यारत मनणामाई तीर्थ से प्रवाहित होने वाली पतित पावनी मदानी नदी के किनारे बसी कालीमठ घाटी प्राचीन काल से ही धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रमुख केन्द्र रही है। हिमालय की गोद में बसी यह पवित्र घाटी अपनी दिव्यता, आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण देश-विदेश के श्रद्धालुओं तथा प्रकृति प्रेमियों को सदियों से आकर्षित करती आ रही है।

पौराणिक मान्यताओं और लोक आस्थाओं से परिपूर्ण कालीमठ घाटी की विशिष्ट पहचान आज भी बरकरार है। इस घाटी का मुख्य आकर्षण शक्तिपीठ कालीमठ मंदिर है, जहाँ माता काली की अद्भुत और रहस्यमयी उपासना की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। मान्यता है कि इसी पावन धरा पर देवी ने दैत्यों का संहार कर देवताओं और ऋषियों की रक्षा की थी।

यही कारण है कि यह स्थान शक्ति साधना और तपस्या की भूमि के रूप में विख्यात है। वर्ष भर देश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु यहाँ पहुंचकर पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

धार्मिक आस्था के साथ-साथ कालीमठ घाटी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी जानी जाती है। यहाँ के लोक पर्व, मेलों, धार्मिक अनुष्ठानों और देवी-देवताओं की परंपरागत यात्राओं में स्थानीय संस्कृति और लोकजीवन की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही ये परंपराएँ आज भी लोगों के जीवन में आस्था और सामाजिक एकता का संदेश देती हैं।

इन दिनों कालीमठ घाटी का प्राकृतिक सौंदर्य भी अपने चरम पर है। घाटी के पग-पग पर विभिन्न प्रजातियों के रंग-बिरंगे पुष्प खिल उठे हैं, जिससे सम्पूर्ण क्षेत्र मनमोहक दिखाई दे रहा है। पहाड़ों की ढलानों, खेत-खलिहानों और जंगलों में खिले फूलों की सुगंध वातावरण को मधुर बना रही है। प्रकृति का यह अनुपम श्रृंगार स्थानीय लोगों के साथ-साथ यहाँ आने वाले पर्यटकों को भी विशेष रूप से आकर्षित कर रहा है।

वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही घाटी के जंगलों और पर्वतीय ढलानों में रंगों की छटा बिखरने लगी है। बुरांश, फ्यूंली और अन्य जंगली पुष्पों की बहार से पूरा क्षेत्र जीवंत हो उठा है। हरियाली और पुष्पों की यह छटा हिमालयी प्रकृति की समृद्धि और सौंदर्य का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है।

पण्डित दिनेश चन्द्र गौड़ का मानना है कि कालीमठ घाटी केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि प्रकृति और संस्कृति के अद्वितीय संगम की भूमि है। यहाँ की शांत, पवित्र और सौंदर्य से परिपूर्ण वादियाँ मानव को आध्यात्मिक शांति और आत्मिक ऊर्जा प्रदान करती हैं। यही कारण है कि कालीमठ घाटी को हिमालय की आस्था, संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम प्रतीक माना जाता है।

प्रधान संगठन ब्लांक अध्यक्ष त्रिलोक सिंह रावत, सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश सत्कारी, पूर्व प्रधान लक्ष्मण सिंह सत्कारी, मुलायम सिंह तिन्दोरी बताते हैं कि इन दिनों काली घाटी के पग – पग बसन्त ऋतु अपने पूर्ण यौवन पर होने से प्राकृतिक सुंदरता पर चार चांद लगे हुए हैं। पूर्व प्रधान अरविन्द राणा, आशा सती का कहना है कि कालीमठ घाटी प्राचीन काल से देवी – देवताओं की तप व साधना स्थली रही है।

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