मार्च के प्रथम सप्ताह में बढ़ी गर्मी, प्रकृति में दिखने लगा रुखापन, प्राकृतिक जल स्रोतों पर संकट
तापमान में असामान्य वृद्धि से जंगल, खेत और जलस्रोत प्रभावित

लक्ष्मण सिंह नेगी/ऊखीमठ।
रुद्रप्रयाग।मार्च माह के प्रथम सप्ताह में तापमान में अचानक हुई भारी वृद्धि से पहाड़ी क्षेत्रों की प्रकृति में रुखापन महसूस होने लगा है। सामान्यतः इस समय तक मौसम में हल्की ठंडक बनी रहती है, किंतु इस वर्ष तापमान में अप्रत्याशित बढ़ोतरी के कारण वातावरण में गर्मी का असर स्पष्ट दिखाई देने लगा है।
इसका प्रभाव जंगलों, खेतों और प्राकृतिक जल स्रोतों पर भी पड़ने लगा है। क्षेत्र के अनेक प्राकृतिक जल स्रोत, धाराएँ और छोटे-छोटे गदेरे सूखने की कगार पर पहुँच गए हैं। कई स्थानों पर जल स्तर में काफी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे ग्रामीणों को पेयजल और पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
जिन जलस्रोतों से वर्ष भर पानी उपलब्ध रहता था, उनमें भी इस समय पानी का प्रवाह कम हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते वर्षा नहीं हुई तो आने वाले महीनों में जल संकट और गंभीर हो सकता है। खेतों में खड़ी फसलों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार तापमान में अचानक वृद्धि और वर्षा की कमी से मिट्टी की नमी तेजी से कम हो रही है, जिससे फसलों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। वन क्षेत्रों में भी सूखे की स्थिति धीरे-धीरे बढ़ती दिखाई दे रही है।
पेड़-पौधों की पत्तियाँ समय से पहले सूखने लगी हैं तथा कई स्थानों पर जंगलों में नमी कम होने से वनाग्नि का खतरा भी बढ़ गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से मौसम के स्वरूप में लगातार बदलाव देखा जा रहा है, जो पर्यावरण के लिए चिंता का विषय है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी इस स्थिति का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान का असामान्य उतार-चढ़ाव प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है, जिसका सीधा असर जल स्रोतों और जैव विविधता पर पड़ रहा है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और पर्यावरण प्रेमियों ने सरकार तथा संबंधित विभागों से प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण, जल संचयन और वनीकरण के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी उपाय नहीं किए गए तो भविष्य में जल संकट और भी विकराल रूप ले सकता है।
वर्तमान परिस्थितियों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और हरियाली बढ़ाने की दिशा में सामूहिक प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं। तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखा जा सकेगा। पूर्व प्रधान प्रेमलता पंत ने बताया कि इस वर्ष मौसम के अनुकूल बर्फबारी व बारिश न होने से तापमान में भारी वृद्धि महसूस होने लगी है तथा प्राकृतिक जल स्रोतों के जल स्तर पर भारी गिरावट महसूस होने लगी है।
क्षेत्र पंचायत सदस्य फलासी दिनेश नेगी का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मार्च महीने में पारा चढ़ने लगा है तथा इस वर्ष मई – जून में पहाड़ों के तापमान भारी वृद्धि होने की सम्भावनाओ से इनकार नहीं किया जा सकता है।



