उत्तराखंड के पहाड़ों पर बढ़ता खतरा – दरकते पहाड़, सिसकते पहाड़, नियमों की उड़ रही धज्जियां

रुद्रप्रयाग। पहाड़ों में इस तरह के विशाल बहुमंजिला निर्माण को देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बताया जा रहा है कि रुद्रप्रयाग में एक गुरुद्वारा बन रहा है, लेकिन सवाल ये नहीं कि कौन बना रहा है। सवाल ये है कि इतनी बड़ी संरचना को संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में अनुमति कैसे मिल गई? NGT के नियम, पर्यावरणीय मापदंड और भूगर्भीय सुरक्षा को कैसे नजरअंदाज किया जा रहा है?
उत्तराखंड की पहाड़ियों की वहन क्षमता (Carrying Capacity) बेहद सीमित है। हर साल बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं से हम पहले ही जूझ रहे हैं। ऐसे में अनियंत्रित बहुमंजिला निर्माण प्रकृति पर अतिरिक्त बोझ ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ा खतरा भी पैदा कर रहा है।
पहाड़ काटकर होटल-रिसॉर्ट खड़े करना, जंगलों को निगलते निर्माण, सड़कों पर बढ़ता दबाव — ये सब मिलकर हमारे उत्तराखंड को कमजोर कर रहे हैं। जब आपदा आती है तो पूरा प्रदेश तबाह होता है, लेकिन अनुमतियाँ देने वाले और चुप रहने वाले कहाँ होते हैं?
मुद्दा किसी एक धर्म या एक गुरुद्वारे का नहीं है।�मंदिर हो, गुरुद्वारा हो या कोई भी निर्माण — पहाड़ों में विकास का मतलब पर्यावरण और सुरक्षा से समझौता नहीं होना चाहिए।
हम विकास चाहते हैं, लेकिन सुरक्षित और संतुलित विकास। नहीं तो एक दिन ये पहाड़ हमें जवाब देंगे — और वो जवाब बहुत भारी पड़ेगा।
जागरूकता फैलाएं, आवाज उठाएं। उत्तराखंड बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।



