आस्था, प्रकृति और लोकजीवन का अद्भुत संगम – विसुणीताल
सोन पर्वत के आंचल में सुरम्य मखमली बुग्यालों के मध्य बसा ताल

लक्ष्मण सिंह नेगी
ऊखीमठ । मदमहेश्वर घाटी की पावन धरा से ऊपर, सोन पर्वत की शांत तलहटी में अवस्थित विसुणीताल युगों से अपनी अलौकिक छटा के कारण श्रद्धालुओं, प्रकृति प्रेमियों और ट्रैकर्स के आकर्षण का केंद्र रहा है। समुद्रतल से लगभग 4 हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित यह हिमताल धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य और पहाड़ी लोकजीवन का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है।
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार विसुणीताल का संबंध भगवान विष्णु से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि देवाधिदेव की इस भूमि पर देवताओं का निवास रहा है और यहाँ स्नान-ध्यान करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। मदमहेश्वर धाम की यात्रा के दौरान कई श्रद्धालु कठिन पैदल मार्ग पार कर इस पवित्र ताल के दर्शन हेतु पहुंचते हैं। शांत, निर्मल और पारदर्शी जल से भरा यह ताल आध्यात्मिक साधना के लिए भी अनुकूल स्थल माना जाता है।
सोन पर्वत की हिमाच्छादित चोटियाँ जब सूर्योदय की प्रथम किरणों से स्वर्णिम आभा बिखेरती हैं तो विसुणीताल का जल दर्पण की भांति चमक उठता है। चारों ओर फैले बुग्याल, नीला आसमान और दूर-दूर तक फैली हिम रेखाएं प्रकृति की अनुपम कृति का एहसास कराती हैं। गर्मियों के मौसम में जब बर्फ पिघलती है, तब यह क्षेत्र हरियाली और रंग-बिरंगे फूलों से सुसज्जित हो उठता है।
विसुणीताल के आसपास के बुग्यालों में ब्रह्मकमल, फेनकमल, नीलकमल , जया , विजया , कुखडी, माखुडी , रातों की रानी सहित विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। बरसात और ग्रीष्म ऋतु के संधिकाल में पूरा क्षेत्र प्राकृतिक पुष्पवाटिका में परिवर्तित हो जाता है। इन दुर्लभ फूलों की सुगंध और रंगत पर्यावरण प्रेमियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है।
भेड़पालकों का मौसमी प्रवास ।
विसुणीताल के आसपास के ऊंचाई वाले घास के मैदानों में ग्रीष्मकाल के दौरान स्थानीय भेड़पालक अपने झुंड के साथ पहुंचते हैं। बुरुवा , गैड़ और गडगू क्षेत्र के पशुपालक परंपरागत रूप से इन बुग्यालों में डेरा डालते हैं। वे अस्थायी झोपड़ियां बनाकर कई सप्ताह तक यहां प्रवास करते हैं। उनके लिए यह क्षेत्र प्राकृतिक चारे का भंडार है। भेड़-बकरियों की घंटियों की मधुर ध्वनि और भेड़ पालकों के लोकगीत इस शांत वातावरण में जीवन का स्पंदन भर देते हैं।
साहसिक पर्यटन की अपार संभावनाएं ।
विसुणीताल तक पहुंचने का मार्ग चुनौतीपूर्ण किंतु रोमांचकारी है। मदमहेश्वर घाटी के बुरुवा और गडगू गांवो से आगे का ट्रैक संकरा और ऊबड़-खाबड़ है, जहां अनुभवी गाइड के साथ जाना उपयुक्त माना जाता है। साहसिक पर्यटकों के लिए यह ट्रैक हिमालय की वास्तविक सुंदरता से साक्षात्कार कराता है। पूर्व प्रधान सरोज भट्ट का कहना है कि यदि केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग की पहल पर प्रदेश सरकार द्वारा आधारभूत सुविधाओं का संतुलित विकास किया जाए तो यह स्थल धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ इको-टूरिज्म का भी प्रमुख केंद्र बन सकता है।
संरक्षण की आवश्यकता
प्राकृतिक दृष्टि से संवेदनशील इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। प्रधान संगठन ब्लांक महामंत्री मदन भट्ट , पूर्व जिला पंचायत सदस्य विनोद राणा , पूर्व प्रधान प्रेमलता पंत ने विसुणीताल के संरक्षण, कूड़ा प्रबंधन और अनियंत्रित भीड़ पर नियंत्रण के लिए ठोस नीति बनाने की मांग की है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अनुपम धरोहर का साक्षात्कार कर सकें।
भेड़पालक वीरेन्द्र धिरवाण, प्रेम भट्ट , नव युवक मंगल दल अध्यक्ष रघुवीर सिंह नेगी का कहना है कि विसुणीताल केवल एक हिमताल नहीं, बल्कि आस्था, प्रकृति और पारंपरिक जीवन शैली का जीवंत प्रतीक है। सोन पर्वत की गोद में बसा यह स्थल मदमहेश्वर घाटी की विशिष्ट पहचान को और अधिक गौरवान्वित करता है।



