कागजों में पानी, जमीन पर प्यास! करोड़ों खर्च फिर भी ग्रामीणों को नहीं मिला पानी
जलजीवन मिशन पर सवाल: ढाई करोड़ की योजना बनी, लेकिन टंकियों में आज तक पानी नहीं ! दस दिन से प्यासा आंकुवाला गांव, आखिर जिम्मेदार कौन?

विनोद जोशी कौलागढ़/ देहरादून। एक तरफ देश में विकसित भारत और हर घर जल का सपना दिखाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ राजधानी देहरादून से महज सात-आठ किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव आज भी पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहीं एक घंटे की पानी की सप्लाई से गुजारा करना पड़ रहा है, तो कहीं पिछले दस दिनों से नलों में पानी की एक बूंद तक नहीं आई।



हैरानी की बात यह है कि इन गांवों में पानी पहुंचाने के नाम पर लाखों और करोड़ों रुपये की योजनाएं बनाई गईं, लेकिन कई योजनाएं आज तक ग्रामीणों के काम नहीं आ सकीं।
सहसपुर विधानसभा क्षेत्र के जामुनवाला, आंकुवाला, फुलसनी एन्क्लेव, फुलसनी, कोठड़ा संतौर और नंदा फार्म सहित आसपास के क्षेत्रों में करीब आठ से नौ हजार की आबादी पेयजल संकट से जूझ रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब राजधानी के इतने नजदीक बसे गांवों में लोगों को पीने का पानी मयस्सर नहीं हो रहा, तो दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति क्या होगी?
स्थानीय लोगों के मुताबिक, इतने बड़े क्षेत्र में जलापूर्ति के लिए फिलहाल एक ट्यूबवेल पर निर्भरता है। बढ़ती आबादी के मुकाबले यह व्यवस्था नाकाफी साबित हो रही है।
स्थानीय निवासी और 80 वर्षीय सेवानिवृत्त वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक दरियाव सिंह तोमर बताते हैं कि वर्ष 2012-13 में फुलसनी में एक ट्यूबवेल और पानी की टंकी बनाई गई थी। शुरुआत में इससे गांव में पानी की आपूर्ति होती रही, लेकिन आबादी बढ़ने के साथ पेयजल संकट भी गहराता चला गया।
वहीं शिक्षिका गायत्री ध्यानी के अनुसार, गांव में पानी की समस्या को देखते हुए ओवरहेड टैंक बनाने की मांग उठाई गई थी। जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण योजना अटक रही थी। ऐसे में पूर्व ग्राम प्रधान श्रीमती कृष्णा देवी ने अपनी 400 गज भूमि विभाग को उपलब्ध कराई, जिस पर ओवरहेड टैंक का निर्माण हुआ। लेकिन टैंक बनने के बावजूद गांव की प्यास नहीं बुझ सकी।
गांव में चार-पांच हैंडपंपों में मोटर लगाकर पानी की आपूर्ति की जाती है। एक हैंडपंप से 12 से 15 परिवारों को जोड़ा गया है और कई जगह महज एक घंटे पानी मिलता है। ऊपर से लो वोल्टेज, बिजली कटौती और मोटर खराब होने जैसी समस्याएं ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा रही हैं। पशुपालक परिवारों के लिए यह संकट और भी गंभीर है।
अब बात करते हैं उस योजना की, जिस पर लाखों रुपये खर्च हुए, लेकिन ग्रामीणों को उसका लाभ तक नहीं मिला।
सामाजिक कार्यकर्ता विनोद जोशी के मुताबिक, टिहरी बांध परियोजना से प्रभावित कुछ परिवारों को जामुनवाला और मसंदावाला में आवास तथा खेती के लिए जमीन आवंटित की गई थी। वर्ष 2004-05 में टीएचडीसी की ओर से विस्थापितों के लिए यहां ट्यूबवेल और ओवरहेड टैंक बनाया गया। सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण भी हुआ।
लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद ट्यूबवेल को चालू नहीं किया गया। नतीजा यह हुआ कि अच्छी गुणवत्ता वाला पानी उपलब्ध होने के बावजूद ट्यूबवेल कबाड़ में तब्दील हो गया।
ग्रामीणों के अनुसार, जिन विस्थापितों के लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी, उनमें से कई परिवार यहां नहीं बसे और अपनी जमीनें बेचकर चले गए। बाद में दूसरे परिवारों ने यहां मकान बना लिए। लेकिन आज भी स्थानीय लोग उस ट्यूबवेल का पानी इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं।
सवाल यह है कि जब पानी की व्यवस्था के लिए सरकारी धन खर्च किया गया था, तो उस योजना को चालू क्यों नहीं किया गया? इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
हैरानी की दूसरी तस्वीर जामुनवाला गांव में ही देखने को मिलती है। जल जीवन मिशन के अंतर्गत करीब ढाई करोड़ रुपये की लागत वाली करनपुर-गुजराड़ा पेयजल योजना के तहत वर्ष 2023 में अंडरग्राउंड टैंक और ओवरहेड टैंक का निर्माण किया गया।
लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण के बावजूद इन टैंकों में आज तक पानी की आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी। करोड़ों की लागत से बनी व्यवस्था ग्रामीणों के लिए उपयोगी साबित नहीं हुई।
और अब आंकुवाला गांव का हाल सुनिए।
यहां पेयजल संकट इतना गंभीर है कि ग्रामीण लगातार दस दिनों से पानी की समस्या झेल रहे हैं। यहां भी हैंडपंप में मोटर लगाकर पानी की आपूर्ति की जाती है। मोटर चलाने के लिए एक निजी घर से बिजली कनेक्शन लिया गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जलसंस्थान की ओर से बिजली का बिल जमा नहीं किया गया, जिसके चलते मकान मालिक ने बिजली कनेक्शन से मोटर चलाने पर रोक लगा दी। इसका खामियाजा पूरे गांव को भुगतना पड़ रहा है।
ग्रामीणों की मांग है कि आंकुवाला में नया ट्यूबवेल स्थापित किया जाए, टीएचडीसी की ओर से बनाए गए पुराने ट्यूबवेल और ओवरहेड टैंक को तत्काल चालू किया जाए तथा गांव में पहले से निर्मित ओवरहेड टैंक को भी उपयोग में लाया जाए।
इसके साथ ही ग्रामीण चाहते हैं कि जिन अधिकारियों की लापरवाही से योजनाएं निर्माण के बाद भी वर्षों तक चालू नहीं हो पाईं, उनकी जिम्मेदारी तय की जाए और उचित कार्रवाई हो।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर पेयजल योजनाएं बनाने के बाद उन्हें जनता को समर्पित करना क्यों भूल जाता है सिस्टम? करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अगर ग्रामीणों को पीने का पानी नहीं मिल रहा, तो इन योजनाओं की उपयोगिता और जवाबदेही पर सवाल उठना लाजिमी है।
राजधानी के इतने नजदीक बसे इन गांवों की प्यास कब बुझेगी? क्या जिम्मेदार विभाग इन सूखी टंकियों और कबाड़ हो चुके ट्यूबवेलों को दोबारा चालू कर पाएंगे, या ग्रामीणों को यूं ही बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष करना पड़ेगा?
“यह सिर्फ पानी का संकट नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और जवाबदेही पर बड़ा सवाल है। आखिर कब तक ग्रामीणों को पानी के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिलते रहेंगे?”



